यूपी में बीजेपी काट सकती है 100 विधायकों के टिकट! 2024 लोकसभा चुनाव वाली गलती से सबक, कमजोर जनाधार और एंटी इनकंबेंसी पर होगी नजर

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच बीजेपी टिकट बंटवारे को लेकर इस बार काफी सतर्क नजर आ रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पार्टी करीब 100 मौजूदा विधायकों के टिकट पर पुनर्विचार कर सकती है। आंतरिक सर्वे में जिन विधायकों का जनाधार कमजोर पाया जाएगा, उनके टिकट काटने पर पार्टी विचार कर सकती है।

पार्टी के स्तर पर विधानसभा क्षेत्रवार सर्वे कराए जाने की बात सामने आ रही है। इसमें विधायकों की जनता के बीच पकड़, स्थानीय संगठन के साथ उनके संबंध और क्षेत्र में एंटी इनकंबेंसी जैसे पहलुओं को देखा जा रहा है। इसके अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी विधायकों को लेकर राय लिए जाने की बात कही गई है।

जनता के बीच विधायकों की पकड़ पर हो रहा सर्वे

रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी इस बार टिकट देने में सबसे ज्यादा महत्व जीतने की संभावना को दे सकती है। विधायक की वरिष्ठता को इसके बाद देखा जाएगा। उत्तर प्रदेश में बीजेपी लगातार दो बार सरकार बना चुकी है और ऐसे कई विधायक हैं जो करीब 10 वर्षों से अपनी सीट पर काबिज हैं। ऐसे में लंबे समय से विधायक रहने वाले नेताओं के खिलाफ संभावित नाराजगी और एंटी इनकंबेंसी को भी पार्टी के स्तर पर परखा जा रहा है।

स्थानीय पदाधिकारियों के साथ मतभेद भी कई विधायकों के लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं। पार्टी स्तर पर यह आकलन किया जा रहा है कि संगठन के साथ विधायक के संबंधों का असर चुनावी प्रदर्शन पर कितना पड़ सकता है।

युवा और नए चेहरों पर भी दांव लगाने की तैयारी

बीजेपी इस बार कई पुराने चेहरों की जगह नए और युवा नेताओं को मौका देने पर भी विचार कर सकती है। संगठन के भीतर होने वाली खींचतान और स्थानीय पदाधिकारियों से विवाद का असर चुनाव में पड़ने की आशंका को देखते हुए पार्टी ऐसे विधायकों को लेकर भी सतर्क है।

पिछले कुछ समय से देश की राजनीति में जेन-जी को लेकर चर्चा बढ़ी है। ऐसे में पार्टी युवा मतदाताओं तक पहुंच बनाने के लिए संगठन और चुनावी मैदान में नए चेहरों को ज्यादा प्राथमिकता देने पर विचार कर सकती है।

2024 के लोकसभा चुनाव से बीजेपी ने लिया सबक

2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सीटों की संख्या में 30 सीटों की कमी आई थी। पार्टी की सीटें 62 से घटकर 33 रह गई थीं। उस चुनाव में बीजेपी ने अपने 49 पुराने सांसदों को दोबारा टिकट दिया था, जिनमें से 27 चुनाव हार गए थे।

इसी अनुभव के बाद अब विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण को लेकर पार्टी अधिक सावधानी बरत सकती है। हालांकि, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि सिर्फ किसी विधायक के लगातार चुनाव जीतने के आधार पर टिकट नहीं काटा जाएगा। अगर किसी विधायक ने अपना जनाधार बनाए रखा है और उसके दोबारा जीतने की संभावना है, तो उसके कितनी बार विधायक रहने को प्राथमिक आधार नहीं बनाया जाएगा।

एंटी इनकंबेंसी के साथ सामाजिक समीकरण भी चुनौती

उत्तर प्रदेश में बीजेपी के सामने एंटी इनकंबेंसी के अलावा सामाजिक समीकरण साधने की चुनौती भी है। रिपोर्ट्स में सवर्ण मतदाताओं के एक हिस्से के छिटकने की बात कही जा रही है। ऐसे में पार्टी का ध्यान दलित मतदाताओं पर भी रह सकता है।

वहीं, समाजवादी पार्टी पिछड़ा, दलित और आदिवासी समीकरण के साथ आगे बढ़ रही है। ऐसे में बीजेपी के सामने अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच अपना आधार बनाए रखने की चुनौती होगी।

टिकट वितरण में नए चेहरों, युवा नेताओं और क्षेत्र में लोकप्रियता को महत्व देना बीजेपी की आगामी चुनावी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। अंतिम फैसला पार्टी के आंतरिक सर्वे, संगठनात्मक फीडबैक और चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखकर लिए जाने की बात कही जा रही है।

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